ग्वालियर जिले का घाटीगांव वन्यजीव अभयारण्य और उसके आसपास के गांव इन दिनों एक अनजाने डर के साये में हैं। कूनो नेशनल पार्क से लंबी दूरी तय कर चीता ‘KAP-1’ अब घाटीगांव के जंगलों और उससे सटे रिहायशी इलाकों तक पहुँच गया है। पिछले 24 घंटों के दौरान चीते को कई बार खेतों और गांव की बाहरी सीमाओं पर देखा गया है, जिसके बाद पूरे क्षेत्र में ‘दहशत’ का माहौल है।
वन विभाग की टीम चीते की लोकेशन को सैटेलाइट और ड्रोन के जरिए ट्रैक कर रही है, लेकिन घनी झाड़ियों और खेतों में खड़ी फसलों के कारण सीधी निगरानी में चुनौतियां आ रही हैं।
सफरनामा: कूनो से घाटीगांव तक की पदचाप
विशेषज्ञों के अनुसार, चीते अपनी प्रकृति के कारण नए क्षेत्रों की तलाश में लंबी दूरी तय करते हैं।
- भटकाव या अन्वेषण: चीता ‘KAP-1’ कूनो की सीमा लांघकर शिवपुरी के जंगलों से होता हुआ ग्वालियर की सीमा में दाखिल हुआ है।
- प्रत्यक्षदर्शी: घाटीगांव के पास स्थित एक गांव के किसान ने अलसुबह अपने खेत में एक ‘तेज रफ्तार और लंबी टांगों वाले’ जानवर को देखा, जिसकी पुष्टि बाद में वन विभाग ने चीते के पगमार्क (पदचिह्न) देखकर की।
वन विभाग की सख्त ‘एडवाइजरी’: क्या करें और क्या न करें?
चीते की मौजूदगी की पुष्टि होते ही वन विभाग के अमले ने गांवों में मुनादी (घोषणा) करवा दी है। ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए विभाग ने सख्त निर्देश जारी किए हैं:
- समूह में निकलें: ग्रामीणों को सलाह दी गई है कि वे खेतों में अकेले न जाएं। कम से कम 4-5 लोग एक साथ रहें और लाठी-डंडे साथ रखें।
- रात में बाहर निकलने से बचें: चीते रात के अंधेरे में अधिक सक्रिय होते हैं। इसलिए, रात के समय घरों से बाहर न निकलें और मवेशियों को सुरक्षित बाड़ों में रखें।
- शोर का प्रयोग: यदि खेत में जाना अनिवार्य हो, तो तेज आवाज में बात करें या रेडियो/संगीत बजाएं ताकि जानवर इंसान की मौजूदगी से दूर भाग जाए।
- मवेशियों की सुरक्षा: छोटे बछड़ों और बकरियों को खुले में न बांधें, क्योंकि वे चीते के लिए आसान शिकार हो सकते हैं।
निगरानी में जुटी विशेष ‘चीता टीम’
कूनो से आई एक्सपर्ट्स की एक विशेष टीम और ग्वालियर वन वृत्त का अमला संयुक्त रूप से ऑपरेशन चला रहा है।
- रेडियो कॉलर का उपयोग: ‘KAP-1’ के गले में रेडियो कॉलर लगा हुआ है, जिससे उसकी लोकेशन हर कुछ मिनटों में अपडेट हो रही है। फिलहाल वह घाटीगांव अभयारण्य के बफर जोन में घूम रहा है।
- ट्रैंक्विलाइजर गन तैयार: यदि चीता किसी गांव के अंदर घुसता है या इंसानों के लिए खतरा बनता है, तो उसे बेहोश (Tranquilize) कर वापस कूनो भेजने की तैयारी भी कर ली गई है।
ग्रामीणों की चिंता: खेती और पशुपालन पर संकट
घाटीगांव के ग्रामीणों के लिए यह समय दोहरी मुसीबत का है। एक ओर खेतों में फसल कटाई और सिंचाई का काम चल रहा है, वहीं दूसरी ओर चीते का खौफ उन्हें खेतों में जाने से रोक रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि “हम डरे हुए हैं कि कहीं चीता हमारे बच्चों या मवेशियों पर हमला न कर दे।” हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि चीते आमतौर पर इंसानों पर हमला नहीं करते जब तक कि उन्हें उकसाया न जाए।
निष्कर्ष: वन्यजीव और मानव के बीच तालमेल की चुनौती
चीता ‘KAP-1’ का घाटीगांव पहुँचना यह दर्शाता है कि चीता प्रोजेक्ट के तहत छोड़े गए जीव अब अपने प्राकृतिक विस्तार के लिए तैयार हैं। लेकिन, रिहायशी इलाकों में इनकी मौजूदगी सुरक्षा की दृष्टि से चिंताजनक है। वन विभाग का मुख्य उद्देश्य चीते को सुरक्षित वापस जंगल की गहराई में धकेलना है ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) की स्थिति पैदा न हो।







