मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने हाल ही में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) की सुनवाई के दौरान ग्वालियर एसएसपी (SSP) और स्थानीय पुलिस प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है। मामला एक महिला और उसके बच्चे की “कथित बरामदगी” से जुड़ा है, जिसमें पुलिस द्वारा पेश की गई कहानी पर कोर्ट ने न केवल असंतोष जताया, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली को “तथ्यों के साथ खिलवाड़” और “झूठी वाहवाही” करार दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद एक घरेलू कलह और बच्चे की कस्टडी से जुड़ी याचिका के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता योगेश (बदला हुआ नाम) ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी कि उसकी पत्नी और बच्चे लापता हैं और उन्हें पेश किया जाए।
- पुलिस का दावा: सुनवाई के दौरान पुलिस विभाग की ओर से यह रिपोर्ट पेश की गई कि एसएसपी ग्वालियर के कुशल नेतृत्व में पुलिस टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद महिला और बच्चे को “बरामद” (Recover) कर लिया है।
- हकीकत का खुलासा: जब हाई कोर्ट की युगलपीठ ने मामले की गहराई से जांच की और संबंधित महिला आरक्षक व अधिकारियों से पूछताछ की, तो सच्चाई कुछ और ही निकली। पता चला कि महिला और बच्चा किसी पुलिस टीम द्वारा खोजे नहीं गए थे, बल्कि पुलिस की सूचना मिलने पर वे खुद स्वेच्छा से मुरार थाने में उपस्थित हुए थे।
हाई कोर्ट की तीखी टिप्पणियां
जस्टिस की खंडपीठ ने एडिशनल एडवोकेट जनरल के माध्यम से एसएसपी को फटकार लगाते हुए कई गंभीर सवाल पूछे:
- झूठी वाहवाही क्यों?: कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा, “आपके एसएसपी ताल ठोककर दावा करते हैं कि उन्होंने कॉर्पस (गुमशुदा व्यक्तियों) को बरामद किया है, जबकि हकीकत में वे खुद थाने पहुंचे थे। पुलिस इस तरह की झूठी वाहवाही क्यों लूट रही है?”
- तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना: कोर्ट ने नाराजगी जताई कि पुलिस केस डायरी और स्टेटस रिपोर्ट में इस तरह से तथ्यों को पेश करती है जैसे उन्होंने कोई बड़ा ऑपरेशन चलाकर सफलता हासिल की हो। कोर्ट ने इसे न्याय प्रक्रिया को गुमराह करने जैसा बताया।
- महिला आरक्षक का बयान: जब कोर्ट ने मौके पर मौजूद महिला आरक्षक से पूछा कि “आप इन्हें कहाँ से लाए हैं?”, तो जवाब मिला कि “वे थाने में ही थे।” इस विरोधाभास ने पुलिस के दावों की पोल खोल दी।
मामले का भावनात्मक पहलू
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि मामला पति-पत्नी के बीच के गंभीर विवाद का था। पति का आरोप था कि पत्नी बच्चे को लेकर अलग रह रही है और उससे मिलने के बदले भारी रकम (50 लाख रुपये) की मांग कर रही है। वहीं, पत्नी ने अपने पक्ष में पति के व्यवहार और घरेलू हिंसा से जुड़ी बातें रखीं। हाई कोर्ट ने इन व्यक्तिगत विवादों के बीच पुलिस की ‘फर्जी रिकवरी’ वाली कार्यशैली को बेहद आपत्तिजनक माना।
भविष्य के लिए निर्देश और प्रभाव
हाई कोर्ट ने इस मामले को केवल एक फटकार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पुलिस विभाग को भविष्य के लिए सचेत भी किया:
- पारदर्शिता की कमी: कोर्ट ने कहा कि पुलिस को अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि बरामदगी पुलिस के प्रयासों से हुई है या व्यक्ति खुद वापस आया है।
- जवाबदेही तय हो: कोर्ट ने संकेत दिए कि यदि भविष्य में हलफनामे (Affidavit) में इस तरह के भ्रामक दावे किए गए, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है।
निष्कर्ष
ग्वालियर हाई कोर्ट की यह फटकार प्रदेश की पुलिस व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। अक्सर आंकड़ों को सुधारने और अपनी पीठ थपथपाने के लिए पुलिस ‘स्वैच्छिक वापसी’ को ‘पुलिस रिकवरी’ के रूप में पेश करती है। हाई कोर्ट के इस कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका की नजरों में केवल ठोस जांच और सत्यनिष्ठा ही मायने रखती है, न कि कागजी वाहवाही।







