ग्वालियर: न्याय की चौखट पर माँ के रिश्ते की हार ग्वालियर की जिला एवं सत्र अदालत ने आज एक ऐसे मामले में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसने पूरे समाज को हिलाकर रख दिया था। एक माँ, जिसे दुनिया का सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जाता है, वही जब अपने बच्चे की जान ले ले, तो कानून का रुख और भी सख्त हो जाता है। अदालत ने अपने ही 5 साल के मासूम बेटे को तीन मंजिला इमारत की छत से नीचे फेंककर मार डालने वाली कलयुगी माँ ज्योति राठौर को ‘आजीवन कारावास’ (उम्रकैद) की सजा सुनाई है। न्यायाधीश ने इस कृत्य को न केवल अपराध, बल्कि मानवता और माँ के पवित्र रिश्ते पर एक अमिट कलंक करार दिया है।
वो काली रात और रोंगटे खड़े कर देने वाली वारदात
यह खौफनाक वारदात ग्वालियर के उपनगर इलाके की है। पुलिस की चार्जशीट के अनुसार, आरोपी ज्योति राठौर का अपने पति और ससुराल पक्ष के साथ अक्सर विवाद होता रहता था। घटना वाले दिन भी घर में भारी कलह हुई थी।
- आवेश में उठाया आत्मघाती कदम: झगड़े के बाद ज्योति अपने 5 साल के बेटे को लेकर छत पर चली गई। गुस्से और बदले की आग में अंधी होकर उसने अपने कलेजे के टुकड़े को तीन मंजिला मकान की छत से नीचे फेंक दिया।
- मासूम की तड़प: बच्चा नीचे फर्श पर गिरते ही गंभीर रूप से घायल हो गया। जब तक पड़ोसी और परिजन उसे अस्पताल पहुँचाते, मासूम ने दम तोड़ दिया था। शुरुआत में ज्योति ने इसे एक दुर्घटना बताने की कोशिश की और कहा कि बच्चा खेलते-खेलते गिर गया है, लेकिन पुलिस की फॉरेंसिक जांच ने इस झूठ की कलई खोल दी।
पुलिस की तफ्तीश और ठोस गवाहियाँ
पुलिस के लिए यह मामला चुनौतीपूर्ण था क्योंकि घर के अंदर की बात थी, लेकिन साक्ष्यों ने सच उगलवा लिया।
- फॉरेंसिक और क्राइम सीन रिक्रिएशन: पुलिस ने जब घटनास्थल का मुआयना किया और क्राइम सीन को री-क्रिएट किया, तो पता चला कि बच्चा खुद से उतनी दूर नहीं गिर सकता था जितनी दूर वह पड़ा मिला था। इससे यह साफ हो गया कि उसे जोर से धक्का दिया गया या फेंका गया था।
- पड़ोसियों के बयान: आसपास के लोगों ने गवाही दी कि उन्होंने ज्योति को बच्चे को घसीटते हुए छत की ओर ले जाते देखा था और उसके बाद बच्चे की चीख सुनी थी। इन चश्मदीदों के बयानों ने अदालत में अभियोजन पक्ष के मामले को बहुत मजबूत बना दिया।
बचाव पक्ष के तर्क और अदालत की टिप्पणी
अदालत में ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने ज्योति को ‘मानसिक रूप से अस्थिर’ बताने की कोशिश की। दलील दी गई कि वह डिप्रेशन का शिकार थी और उसे नहीं पता था कि वह क्या कर रही है।
- अदालत का कड़ा रुख: न्यायाधीश ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि यदि महिला मानसिक रूप से बीमार होती, तो उसके व्यवहार में अन्य संकेत भी मिलते। यह एक सोची-समझी हत्या थी जो गुस्से और रंजिश के कारण की गई। जज ने फैसले में लिखा, “माँ का हाथ बच्चे के सिर पर आशीर्वाद के लिए होता है, लेकिन यहाँ वही हाथ मौत का कारण बन गया। यह समाज के लिए एक चेतावनी है।”
समाज और कानून के लिए एक संदेश
इस फैसले के बाद कानूनी गलियारों में इस बात की चर्चा है कि पारिवारिक विवादों में बच्चों को ‘हथियार’ या ‘शिकार’ बनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
- सजा का प्रावधान: कोर्ट ने ज्योति पर उम्रकैद के साथ-साथ आर्थिक दंड (जुर्माना) भी लगाया है। जुर्माने की राशि जमा न करने पर उसकी सजा और बढ़ाई जा सकती है।
- जेल रवानगी: फैसला सुनाए जाने के तुरंत बाद पुलिस ने ज्योति को हिरासत में ले लिया और कड़ी सुरक्षा के बीच उसे ग्वालियर की केंद्रीय जेल भेज दिया गया।
निष्कर्ष
ग्वालियर कोर्ट का यह फैसला उन सभी लोगों के लिए एक सबक है जो पारिवारिक झगड़ों में मासूमों की बलि चढ़ा देते हैं। कानून ने यह साफ कर दिया है कि अपराध करने वाला चाहे सगा संबंधी ही क्यों न हो, न्याय की तराजू पर केवल सच और साक्ष्य ही भारी पड़ेंगे। मासूम की जान तो वापस नहीं आ सकती, लेकिन इस फैसले ने उसके साथ हुए अन्याय का हिसाब जरूर कर दिया है।







