ग्वालियर से आई यह खबर दिल दहला देने वाली है और शहर के रिहाइशी इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। 16 जनवरी 2026 की यह घटना दर्शाती है कि ग्वालियर में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या अब केवल एक समस्या नहीं, बल्कि मासूम बच्चों के लिए जानलेवा संकट बन चुकी है। नगर निगम की लापरवाही और ‘डॉग कैचिंग’ अभियान की विफलता ने एक बार फिर एक परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है।
ग्वालियर में आवारा कुत्तों का खौफ: मासूम के चेहरे पर आए 25 टांके
घटना का विवरण: खेलते समय हुआ हमला
यह दर्दनाक घटना ग्वालियर के एक पॉश इलाके की है। जानकारी के अनुसार, साढ़े तीन साल का मासूम बच्चा शाम के समय अपने घर के बाहर बरामदे में खेल रहा था। पास में ही उसकी दादी बैठी हुई थीं। तभी अचानक तीन से चार आवारा कुत्तों का एक झुंड वहां आया और सीधे बच्चे पर हमला कर दिया।
इससे पहले कि घर के लोग कुछ समझ पाते या कुत्तों को भगाते, कुत्तों ने बच्चे को जमीन पर गिरा दिया और उसके चेहरे व गर्दन को बुरी तरह नोचना शुरू कर दिया। बच्चे की चीख-पुकार सुनकर जब तक परिजन और पड़ोसी डंडे लेकर दौड़े, तब तक कुत्तों ने बच्चे को बुरी तरह लहूलुहान कर दिया था।
अस्पताल में संघर्ष और गंभीर चोटें
परिजन तुरंत बच्चे को लेकर निजी अस्पताल और फिर जयारोग्य अस्पताल (JAH) के ट्रॉमा सेंटर पहुंचे। डॉक्टरों के अनुसार:
- बच्चे के चेहरे, गाल और कान के पास गहरे घाव हुए हैं।
- जख्म इतने गहरे थे कि मासूम के चेहरे पर 25 टांके लगाने पड़े।
- डॉक्टरों ने बताया कि यदि हमला गर्दन की मुख्य नस पर होता, तो बच्चे की जान बचाना मुश्किल हो जाता। फिलहाल बच्चा खतरे से बाहर है, लेकिन वह गहरे मानसिक सदमे (Trauma) में है।
नगर निगम और प्रशासनिक विफलता
इस घटना ने ग्वालियर नगर निगम के दावों की पोल खोल दी है। शहरवासियों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि करोड़ों रुपये का बजट होने के बावजूद ‘डॉग कैचिंग’ वैन और नसबंदी अभियान केवल कागजों पर चल रहा है।
- नसबंदी अभियान की सुस्ती: नियमों के अनुसार, आवारा कुत्तों की आबादी रोकने के लिए उनकी नसबंदी (Sterilization) अनिवार्य है। लेकिन ग्वालियर के कई वार्डों में पिछले एक साल से यह काम ठप पड़ा है।
- शिकायतों की अनदेखी: स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने संबंधित वार्ड अधिकारी को कई बार इन कुत्तों के आक्रामक होने की शिकायत की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
‘एनिमल लवर्स’ बनाम ‘पब्लिक सेफ्टी’ की बहस
सोशल मीडिया पर इस खबर के वायरल होने के बाद एक बार फिर नई बहस छिड़ गई है।
- एक पक्ष का मानना है कि आवारा कुत्तों को खिलाना और उनकी रक्षा करना पुण्य का काम है।
- वहीं, पीड़ित परिवार और आम नागरिकों का कहना है कि मानवीय जीवन की सुरक्षा किसी भी जानवर के अधिकार से ऊपर होनी चाहिए। लोगों की मांग है कि जो कुत्ते आक्रामक (Aggressive) हो चुके हैं, उन्हें रिहाइशी इलाकों से हटाकर शहर के बाहर शेल्टर होम में भेजा जाना चाहिए।
शहर के अन्य क्षेत्रों में भी दहशत
यह केवल एक इलाके की बात नहीं है। ग्वालियर के थाटीपुर, हजीरा, मुरार और लश्कर के कई हिस्सों में रात के समय पैदल चलना या दोपहिया वाहन चलाना खतरनाक हो गया है। कुत्ते अक्सर वाहनों के पीछे दौड़ते हैं, जिससे आए दिन सड़क दुर्घटनाएं भी हो रही हैं।
निष्कर्ष
साढ़े तीन साल के मासूम पर हुआ यह हमला एक “वेक-अप कॉल” है। यदि प्रशासन अब भी नहीं जागा, तो शहर के पार्क और गलियां बच्चों के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र बन जाएंगी। जरूरत इस बात की है कि नगर निगम न केवल कुत्तों को पकड़ने का अभियान तेज करे, बल्कि एक वैज्ञानिक तरीके से उनकी आबादी को नियंत्रित करने के लिए दीर्घकालिक योजना बनाए।







